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अकबर का जीवन प्रचिय

हमको बचपन से बताया जाता है कि  अकबर एक अच्छा शासक था  परंतु  इस पोस्ट को देखने के बाद  आपको पता चलेगा कि  असल में  अकबर कौन था ....! जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पुस्तक ”डिस्कवरी ऑफ इण्डिया” में अकबर को ‘महान’ कहकर उसकी प्रशंसा की है. हमारे कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने भी अकबर को एक परोपकारी, उदार, दयालु और धर्मनिरपेक्ष शासक बताया है. अकबर के दादा बाबर का वंश तैमूरलंग से था और मातृपक्ष का संबंध चंगेज खां से था. इस प्रकार अकबर की नसों में एशिया की दो प्रसिद्ध आतंकी और खूनी जातियों, तुर्क और मंगोल के रक्त का सम्मिश्रण था. जिसके खानदान के सारे पूर्वज दुनिया के सबसे बड़े जल्लाद थे, और अकबर के बाद भी जहाँगीर और औरंगजेब दुनिया के सबसे बड़े दरिन्दे थे तो ये बीच में महानता की पैदाईश कैसे हो गयी?? इस पर कभी भी किसी ने सामान्य बुद्धि से विचार नहीं किया, क्योंकि वामपंथी ब्रेनवॉश हिन्दुस्तान की रग-रग में समाया हुआ है. अकबर के जीवन पर शोध करने वाले अंग्रेज इतिहासकार विंसेट स्मिथ ने साफ़ लिखा है कि, अकबर एक दुष्कर्मी, घृणित एवं नृशंश हत्याकांड करने वाला क्रूर शासक था. लेकिन नेहरू की निगाह में अकबर महान था. विन्सेंट स्मिथ ने किताब ही यहाँ से शुरू की है कि “अकबर भारत में एक विदेशी था, उसकी नसों में एक बूँद खून भी भारतीय नहीं था. अकबर मुग़ल से ज्यादा एक तुर्क था”. चित्तौड़ की विजय के बाद अकबर ने कुछ फतहनामें प्रसारित करवाये थे. जिससे हिन्दुओं के प्रति उसकी गहन आन्तरिक घृणा प्रकाशित हो गई थी. उनमें से एक फतहनामा पढ़िये -- ”अल्लाह की खयाति बढ़े इसके लिए हमारे कर्तव्य परायण मुजाहिदीनों ने अपवित्र काफिरों को अपनी बिजली की तरह चमकीली कड़कड़ाती तलवारों द्वारा वध कर दिया.” हमने अपना बहुमूल्य समय और अपनी शक्ति घिज़ा (जिहाद) में ही लगा दिया है, और अल्लाह के सहयोग से काफिरों के अधीन बस्तियों, किलों, शहरों को विजय कर अपने अधीन कर लिया है, कृपालु अल्लाह उन्हें त्याग दे और उन सभी का विनाश कर दे. हमने पूजा स्थलों उसकी मूर्तियों को और काफिरों के अन्य स्थानों का विध्वंस कर दिया है।” (फतहनामा-ई-चित्तौड़ मार्च 1586, नई दिल्ली).

 यदि अकबर कालीन लेखकों (और खासकर अकबर के दरबारियों द्वारा खुद अकबर के हस्ताक्षरों से युक्त दस्तावेजों) को देखें तो हम पाते हैं कि अकबर भी मीर कासिम और बाबर की श्रृंखला जितना ही क्रूर, बददिमाग, बलात्कारी, औरतखोर, हत्यारा और घनघोर किस्म का “मुल्ला” ही था. आईये सिलसिलेवार तरीके से देखते हैं कि अकबर पर लिखी गयी कई पुस्तकों तथा उस कालखंड के दस्तावेजों से प्राप्त तथ्य और कथ्य क्या कहते हैं. अधिकाँश पुस्तकें और दस्तावेजों के नाम, पृष्ठ क्रमांक दिए गए हैं, ताकि भारत के इतिहास पर वर्षों से काबिज वामपंथी धूर्त इतिहासकार इसका खंडन न कर सकें.

 इस विजय के तुरन्त बाद अकबर ने काफिरों के कटे हुए सिरों से एक ऊँची मीनार बनवायी। 2 सितम्बर 1573 को भी अकबर ने अहमदाबाद में 2000 दुश्मनों के सिर काटकर अब तक की सबसे ऊँची सिरों की मीनार बनवायी और अपने दादा बाबर का रिकार्ड तोड़ दिया, यानी घर का रिकार्ड घर में ही रहा. अकबरनामा में लिखे तथ्यों के अनुसार 3 मार्च 1575 को अकबर ने बंगाल विजय के दौरान इतने सैनिकों और नागरिकों की हत्या करवायी कि उससे कटे सिरों की आठ मीनारें बनायी गयीं. यह फिर से एक नया रिकार्ड था. जब वहाँ के हारे हुए शासक “दाउद खान” ने मरते समय पानी माँगा, तो अकबर ने उसे जूतों में भरकर पानी पीने के लिए दिया.

 अकबर के समय के इतिहास लेखक अहमद यादगार ने लिखा :- “बैरम खाँ ने निहत्थे और बुरी तरह घायल हिन्दू राजा हेमू के हाथ पैर बाँध दिये और उसे नौजवान शहजादे के पास ले गया और बोला, आप अपने पवित्र हाथों से इस काफिर का कत्ल कर दें और”गाज़ी”की उपाधि कुबूल करें, और शहजादे ने उसका सिर उसके अपवित्र धड़ से अलग कर दिया।” (नवम्बर, 5 AD 1556) (तारीख-ए-अफगान, अहमद यादगार, अनुवाद एलियट एण्ड डाउसन, खण्ड VI, पृष्ठ 65-66). इस तरह अकबर ने मात्र 14 साल की आयु में ही गाज़ी (यानी काफिरों का कातिल) होने का सम्मान(??) पाया. इसके बाद हेमू के कटे सिर को अकबर ने काबुल भिजवा दिया, और धड़ को दिल्ली के दरवाजे पर टांग दिया. इसी में अबुल फजल आगे लिखता है – ”हेमू के पिता को जीवित ले आया गया, और नासिर-उल-मलिक के सामने पेश किया गया... जिसने उसे इस्लाम कबूल करने का आदेश दिया, किन्तु उस वृद्ध पुरुष ने उत्तर दिया, ”मैंने अस्सी वर्ष तक अपने ईश्वर की पूजा की है; मै अपने धर्म को कैसे त्याग सकता हूँ? मौलाना परी मोहम्मद ने उसके उत्तर को अनसुना कर अपनी तलवार से उसका सर काट दिया।” (अकबर नामा, अबुल फजल : एलियट और डाउसन, पृष्ठ 21).

 वामी इतिहासकारों द्वारा अकबर के बारे में सबसे मनगढ़ंत किस्सा यह कि अकबर ने दया करके सतीप्रथा पर रोक लगाई; जबकि इसके पीछे उसका मुख्य मकसद केवल यही था कि राजवंशीय हिन्दू नारियों के पतियों को मरवाकर एवं उनको सती होने से रोककर, अपने हरम में डालकर अय्याशी करना. राजकुमार जयमल की हत्या के पश्चात अपनी अस्मत बचाने को घोड़े पर सवार होकर सती होने जा रही उसकी पत्नी को अकबर ने रास्ते में ही पकड़ लिया. शमशान घाट जा रहे उसके सारे सम्बन्धियों को वहीं से कारागार में सड़ने के लिए भेज दिया, और राजकुमारी को अपने हरम में ठूंस दिया. इसी तरह पन्ना के राजकुमार को मारकर उसकी विधवा पत्नी का अपहरण कर अकबर ने अपने हरम में ले लिया, सती नहीं होने दिया. अकबर अक्सर औरतों के लिबास में मीना बाज़ार जाता था, जो हर नये साल की पहली शाम को लगता था. अकबर अपने दरबारियों को अपनी स्त्रियों को वहाँ सज-धज कर भेजने का आदेश देता था. मीना बाज़ार में जो औरत अकबर को पसंद आ जाती, उसके फौजी उस औरत को उठा ले जाते और कामी अकबर की अय्याशी के लिए हरम में पटक देते. “अकबर महान” उन्हें एक रात से लेकर एक महीने तक अपनी हरम में खिदमत का मौका देते थे, जब शाही दस्ते शहर से बाहर जाते थे तो अकबर के हरम की औरतें जानवरों की तरह महल में बंद कर दी जाती थीं.

 अकबर की गंदी नजर गौंडवाना की विधवा रानी दुर्गावती पर थी… ”सन् 1564 में अकबर ने अपनी हवस की शांति के लिए रानी दुर्गावती पर आक्रमण कर दिया किन्तु एक वीरतापूर्ण संघर्ष के बाद अपनी हार निश्चित देखकर रानी ने अपनी ही छाती में छुरा घोंपकर आत्म हत्या कर ली. किन्तु उसकी बहिन और पुत्रवधू को बन्दी बना लिया गया, और अकबर ने उसे अपने हरम में ले लिया. उस समय अकबर की उम्र 22 वर्ष और रानी दुर्गावती की 40 वर्ष थी।” (आर. सी. मजूमदार, दी मुगल ऐम्पायर, खण्ड VII). सन् 1561 में आमेर के राजा भारमल और उनके तीन राजकुमारों को यातना दे कर उनकी पुत्री को साम्बर से अपहरण कर अपने हरम में आने को मज़बूर किया. औरतों का झूठा सम्मान करने वाले अनपढ़ अकबर ने सिर्फ अपनी हवस मिटाने के लिए न जाने कितनी मुस्लिम औरतों की भी अस्मत लूटी थी. इसमें मुस्लिम नारी चाँद बीबी का नाम भी है. अकबर ने जानबूझकर अपनी सगी बेटी आराम बेगम की पूरी जिंदगी शादी नहीं की, और अंत में उस की मौत अविवाहित ही जहाँगीर के शासन काल में हुई.

 अकबर की चित्तौड़ विजय के विषय में अबुल फजल ने लिखा था- ”अकबर के आदेशानुसार प्रथम 8000 राजपूत योद्धाओं को बंदी बना लिया गया, और बाद में उनका वध कर दिया गया. उनके साथ-साथ विजय के बाद प्रात:काल से दोपहर तक अन्य 40,000 किसानों को भी मार डाला गया जिनमें 3000 बच्चे और बूढ़े थे।” (अकबरनामा, अबुल फजल, अनुवाद - एच.बैबरिज). चित्तौड़ की पराजय के बाद महारानी जयमाल मेतावाड़िया समेत 12,000 क्षत्राणियों ने मुगलों के हरम में जाने की अपेक्षा, जौहर की अग्नि में स्वयं को जलाकर भस्म कर लिया. जरा कल्पना कीजिए विशाल गड्ढों में धधकती आग और दिल दहला देने वाली चीखों-पुकार के बीच उसमें कूदती 12000 महिलाएँ. असल में अपने हरम को सम्पन्न करने के लिए अकबर ने अनेकों हिन्दू राजकुमारियों के साथ जबरन शादियाँ की थी, परन्तु कभी भी किसी मुगल महिला को हिन्दू से शादी नहीं करने दी. केवल अकबर के शासनकाल में 38 राजपूत राजकुमारियाँ शाही खानदान में ब्याही जा चुकी थीं. 12 अकबर को, 17 शाहजादा सलीम को, 6 दानियाल को, 2 मुराद को और 1 सलीम के पुत्र खुसरो को.

 अकबर ने अपनी अय्याशी के लिए इस्लाम का भी दुरुपयोग किया था. चूँकि सुन्नी फिरके के अनुसार एक मुस्लिम एक साथ चार से अधिक औरतें नहीं रख सकता, और जब अकबर उस से अधिक औरतें रखने लगा तो काजी ने उसे रोकने की कोशिश की. इस से नाराज होकर अकबर ने उस सुन्नी काजी को हटा कर, शिया काजी को रख लिया क्योंकि शिया फिरके में असीमित और अस्थायी शादियों की इजाजत है, ऐसी शादियों को अरबी में “मुताह” कहा जाता है. अबुल फज़ल ने अपने लेखन में अकबर के हरम को इस तरह वर्णित किया है - “अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थीं, और ये पांच हजार औरतें उसकी छत्तीस पत्नियों से अलग थीं. शहंशाह के महल के पास ही एक शराबखाना बनाया गया था. वहाँ इतनी वेश्याएं इकट्ठी हो गयीं कि उनकी गिनती करनी भी मुश्किल हो गयी. अगर कोई दरबारी किसी नयी लड़की को घर ले जाना चाहे तो उसको अकबर से आज्ञा लेनी पड़ती थी. कई बार सुन्दर लड़कियों को ले जाने के लिए लोगों में झगड़ा भी हो जाता था. एक बार अकबर ने खुद कुछ वेश्याओं को बुलाया और उनसे पूछा कि उनसे सबसे पहले भोग किसने किया. यहाँ तक कि बैरम खान जो अकबर के पिता जैसा और संरक्षक था, उसकी हत्या करके इसने उसकी पत्नी अर्थात अपनी माता के समान स्त्री से शादी  की।
लेखक
राजेश चौधरी
      गवर्नमेंट कॉलेज डेगाना 

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